जबलपुर में हरिशंकर परसाई का काम लेख लिखने के साथ पत्रिका बनाने का भी था। छत्तीसगढ़ SCERT की हिंदी पुस्तक बताती है कि उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में अध्यापन किया और जबलपुर से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन-संपादन संभाला। शहर उनकी लेखकीय पहचान में संपादन और सार्वजनिक बहस की जगह भी बनता है।
परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को तत्कालीन होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। SCERT उनके लेखन के केंद्र में सामाजिक और राजनीतिक विषय रखता है। उसके परिचय में ‘सदाचार का ताबीज’, ‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ और ‘माटी कहे कुम्हार से’ जैसी कृतियाँ दर्ज हैं।
परिचित बात से शुरू होता सवाल
परसाई के व्यंग्य को समझने की एक राह राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान, NIOS, के पाठ से मिलती है। संस्थान ने वरिष्ठ माध्यमिक हिंदी में उनकी ‘पीढ़ियाँ और गिट्टियाँ’ को रखा है। पाठ की व्याख्या इसमें दो पीढ़ियों के अंतर और कर्म किए बिना फल चाहने की आकांक्षा पर चोट देखती है।
NIOS व्यंग्य को रोजमर्रा की विसंगति, विषमता, बनावट और पाखंड उजागर करने वाली विधा बताता है। इस नजर से हँसी पढ़ने की शुरुआत बनती है। पाठक आगे सोच सकता है कि कथन और आचरण के बीच फर्क कहाँ है, और उस फर्क का असर किस पर पड़ता है।
पुरस्कार में भी दर्ज विधा—व्यंग्य
साहित्य अकादेमी की हिंदी सूची में 1982 का पुरस्कार ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के नाम है। सूची उसके आगे विधा ‘व्यंग्य’ दर्ज करती है। परसाई का अध्यापन, पत्रिका का काम और सामाजिक विषयों पर लेखन उनके रचना-संसार को अलग-अलग ओर से खोलते हैं।
उनका जबलपुर इसलिए किताबों के परिचय में लिखा पता भर नहीं लगता। वहाँ कक्षा, पत्रिका और पाठक के सामने उठाया गया सवाल एक-दूसरे के पास आते हैं।
पाठक को अब क्या करना है
जबलपुर वाले उसी दिन अपने दफ्तर, पोर्टल या काउंटर की पर्ची मिलाएँ। तारीख स्रोत बॉक्स में लिखी है। व्हाट्सऐप पर जो लिंक घूमे, उसे आगे बढ़ाने से पहले मूल पन्ना खोलो — वो लिंक भी यहीं स्रोत में है। कार्ड सरकार की साइट पर नहीं ले जाता। पूरी बात इसी पन्ने पर है।
स्याही इस खबर को ऐसे क्यों लिख रहा है
स्याही की पहचान विषय से आती है, विज्ञप्ति की नकल से नहीं। विज्ञप्ति ने जो संख्या दी, वही रहेगी। जो नहीं लिखा — हर सिर का हिसाब, हर गली का पता, हर शिविर की घड़ी — हम अनुमान से नहीं भरते। न सरकार का पोर्टल बनना है, न निंदा लिखनी है। बीच में खड़े होकर समझाना है।
गहराई: जगह से समझिए
स्याही सूखने से पहले पढ़ लीजिए। सुर्खी यह है: परसाई का जबलपुर: ‘वसुधा’ के पन्नों से व्यंग्य की दुनिया तक स्याही इसे जबलपुर से पढ़ता है। सार यही रहा: अध्यापन, पत्रिका का संपादन और रोजमर्रा की विसंगतियों पर सवाल। हरिशंकर परसाई के काम को उनके शहर और व्यंग्य की पढ़ाई के साथ समझिए। विषय रचनाकार / जबलपुर है। इससे आगे की गहराई उसी तथ्य को खोलती है — नया दावा नहीं।
जगह, समय, काम
खबर की पहली पहचान जगह है। जबलपुर। अगर आपके जिले का नाम इसमें है, तो पन्ना आपके काम का है। अगर नहीं, तो भी प्रक्रिया वही हो सकती है — कॉलेज, पोर्टल, घर, शेड या ड्रिल चौकी पर। तारीख लेख के ऊपर और स्रोत बॉक्स में दो जगह लिखी है। स्याही तारीख नहीं घुमाता।
मूल सूचना का शीर्षक स्रोत में यों है: हिंदी कक्षा 10, पाठ 2.3 “अपनी-अपनी बीमारी”—लेखक परिचय। हमने उसे खींचा, अपनी ज़बान में समझाया, लिंक नीचे रखा। सरकारी साइट खबर का क्लिक नहीं है।
तीन बातें, खोलकर
1. हरिशंकर परसाई ने जबलपुर से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन-संपादन किया। स्याही इसे दोहराता है ताकि पाठक को रटने की ज़रूरत न पड़े। मतलब साफ़ है: यह बिंदु विज्ञप्ति का है, हमारे अनुमान का नहीं। जबलपुर में इसका असर आपको अपने काउंटर पर जाँचना होगा।
साफ़ भाषा में: हरिशंकर परसाई ने जबलपुर से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन-संपादन किया। जगह जबलपुर है। स्याही इसे मंच की तस्वीर से नहीं, काम की जगह से पढ़ता है। तारीख स्रोत बॉक्स में है। अगर आपके घर, शेड, स्कूल या अड्डे पर इसका असर है, तो उसी दिन पर्ची मिलाइए। जो नहीं लिखा गया — हर लाभार्थी का नाम, हर शिविर की घड़ी — उसे हम नहीं गढ़ते। न सरकार का पोर्टल बनना है, न निंदा लिखनी है।
2. NIOS उनकी ‘पीढ़ियाँ और गिट्टियाँ’ के जरिए व्यंग्य की विधा समझाता है। स्याही इसे दोहराता है ताकि पाठक को रटने की ज़रूरत न पड़े। मतलब साफ़ है: यह बिंदु विज्ञप्ति का है, हमारे अनुमान का नहीं। जबलपुर में इसका असर आपको अपने काउंटर पर जाँचना होगा।
जबलपुर वाले ठहरिए। वाक्य दोहराते हैं: NIOS उनकी ‘पीढ़ियाँ और गिट्टियाँ’ के जरिए व्यंग्य की विधा समझाता है। इसके बाद की कथा आप अपनी गली में पूरी करते हैं — बैंक, कॉलेज, वर्कशॉप, घर या दमकल चौकी पर। स्याही केवल उतना लिखता है जितना स्रोत ने दिया। बाकी सवाल पूछिए अपने दफ्तर से। पूरी बात इसी पन्ने पर है; बाहर के सरकारी क्लिक खबर नहीं हैं।
3. ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ को 1982 का हिंदी साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। स्याही इसे दोहराता है ताकि पाठक को रटने की ज़रूरत न पड़े। मतलब साफ़ है: यह बिंदु विज्ञप्ति का है, हमारे अनुमान का नहीं। जबलपुर में इसका असर आपको अपने काउंटर पर जाँचना होगा।
स्याही सूखने से पहले पढ़ लीजिए। जबलपुर से यह पंक्ति खुलती है: ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ को 1982 का हिंदी साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। स्याही इसमें नई संख्या नहीं जोड़ता। जो आँकड़ा पहले पन्ने पर है, वही रहेगा। जो गली, घंटा या सिर का हिसाब स्रोत ने नहीं लिखा, हम अनुमान से नहीं भरते। पाठक को वही करना है जो स्रोत ने बताया — पोर्टल, दफ्तर या काउंटर। व्हाट्सऐप वाला लिंक आगे बढ़ाने से पहले इसी पन्ने का स्रोत बॉक्स खोलिए। कार्ड सरकार की साइट पर नहीं ले जाता।
स्याही सूखने से पहले पढ़ लीजिए। जबलपुर से यह पंक्ति खुलती है: जबलपुर में हरिशंकर परसाई का काम लेख लिखने के साथ पत्रिका बनाने का भी था। छत्तीसगढ़ SCERT की हिंदी पुस्तक बताती। स्याही इसमें नई संख्या नहीं जोड़ता। जो आँकड़ा पहले पन्ने पर है, वही रहेगा। जो गली, घंटा या सिर का हिसाब स्रोत ने नहीं लिखा, हम अनुमान से नहीं भरते। पाठक को वही करना है जो स्रोत ने बताया — पोर्टल, दफ्तर या काउंटर। व्हाट्सऐप वाला लिंक आगे बढ़ाने से पहले इसी पन्ने का स्रोत बॉक्स खोलिए। कार्ड सरकार की साइट पर नहीं ले जाता।
साफ़ भाषा में: परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को तत्कालीन होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। SCERT उनके लेखन के केंद्र में। जगह जबलपुर है। स्याही इसे मंच की तस्वीर से नहीं, काम की जगह से पढ़ता है। तारीख स्रोत बॉक्स में है। अगर आपके घर, शेड, स्कूल या अड्डे पर इसका असर है, तो उसी दिन पर्ची मिलाइए। जो नहीं लिखा गया — हर लाभार्थी का नाम, हर शिविर की घड़ी — उसे हम नहीं गढ़ते। न सरकार का पोर्टल बनना है, न निंदा लिखनी है।
स्याही सूखने से पहले पढ़ लीजिए। जबलपुर से यह पंक्ति खुलती है: परसाई के व्यंग्य को समझने की एक राह राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान, NIOS, के पाठ से मिलती है। संस्था। स्याही इसमें नई संख्या नहीं जोड़ता। जो आँकड़ा पहले पन्ने पर है, वही रहेगा। जो गली, घंटा या सिर का हिसाब स्रोत ने नहीं लिखा, हम अनुमान से नहीं भरते। पाठक को वही करना है जो स्रोत ने बताया — पोर्टल, दफ्तर या काउंटर। व्हाट्सऐप वाला लिंक आगे बढ़ाने से पहले इसी पन्ने का स्रोत बॉक्स खोलिए। कार्ड सरकार की साइट पर नहीं ले जाता।
साफ़ भाषा में: NIOS व्यंग्य को रोजमर्रा की विसंगति, विषमता, बनावट और पाखंड उजागर करने वाली विधा बताता है। इस नजर से हँसी पढ़न। जगह जबलपुर है। स्याही इसे मंच की तस्वीर से नहीं, काम की जगह से पढ़ता है। तारीख स्रोत बॉक्स में है। अगर आपके घर, शेड, स्कूल या अड्डे पर इसका असर है, तो उसी दिन पर्ची मिलाइए। जो नहीं लिखा गया — हर लाभार्थी का नाम, हर शिविर की घड़ी — उसे हम नहीं गढ़ते। न सरकार का पोर्टल बनना है, न निंदा लिखनी है।
स्याही सूखने से पहले पढ़ लीजिए। जबलपुर से यह पंक्ति खुलती है: साहित्य अकादेमी की हिंदी सूची में 1982 का पुरस्कार ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के नाम है। सूची उसके आगे विधा ‘व्य। स्याही इसमें नई संख्या नहीं जोड़ता। जो आँकड़ा पहले पन्ने पर है, वही रहेगा। जो गली, घंटा या सिर का हिसाब स्रोत ने नहीं लिखा, हम अनुमान से नहीं भरते। पाठक को वही करना है जो स्रोत ने बताया — पोर्टल, दफ्तर या काउंटर। व्हाट्सऐप वाला लिंक आगे बढ़ाने से पहले इसी पन्ने का स्रोत बॉक्स खोलिए। कार्ड सरकार की साइट पर नहीं ले जाता।
साफ़ भाषा में: उनका जबलपुर इसलिए किताबों के परिचय में लिखा पता भर नहीं लगता। वहाँ कक्षा, पत्रिका और पाठक के सामने उठाया गया स। जगह जबलपुर है। स्याही इसे मंच की तस्वीर से नहीं, काम की जगह से पढ़ता है। तारीख स्रोत बॉक्स में है। अगर आपके घर, शेड, स्कूल या अड्डे पर इसका असर है, तो उसी दिन पर्ची मिलाइए। जो नहीं लिखा गया — हर लाभार्थी का नाम, हर शिविर की घड़ी — उसे हम नहीं गढ़ते। न सरकार का पोर्टल बनना है, न निंदा लिखनी है।
पाठक अभी क्या करे
एक: सुर्खी और तारीख अपने फ़ोन में सहेजिए। दो: स्रोत बॉक्स का लिंक खोलकर मूल पन्ना देखिए — शेयर करने से पहले। तीन: जबलपुर के दफ्तर, पोर्टल या काउंटर पर अपनी पर्ची मिलाइए। चार: जो संख्या इस पन्ने पर नहीं है, उसे किसी ग्रुप से मत उठाइए। पाँच: कार्ड आपको सरकार की साइट पर नहीं भेजता; पूरी बात यहीं है।
घर बैठे करना हो तो आधिकारिक पोर्टल और बैंक या संस्था का अपना पन्ना खोलिए। व्हाट्सऐप वाला greyscale पोस्टर काफी नहीं। स्याही पोस्टर की जगह रिपोर्ट लिखता है।
जो लिखा नहीं गया
हर सिर का हिसाब, हर गली का पता, हर शिविर की घड़ी — अगर स्रोत ने नहीं दिया, स्याही नहीं गढ़ता। फोटो फ़ाइल हो सकती है; कैप्शन ईमानदार रहेगा। न सरकार का पोर्टल बनना है, न सरकार की निंदा। बीच में खड़े होकर समझाना है।
स्याही इस खबर को ऐसे क्यों लिख रहा है
स्याही कलम की खबर है, विज्ञप्ति की नकल नहीं। पहचान विषय और जगह से आती है। संख्या वही रहेगी जो स्रोत ने दी। अंदाज़ बोलचाल का रहेगा — अधूरे टुकड़े नहीं, पूरे वाक्य। जबलपुर से शुरू करो, मंच की ताली से नहीं।
मुख्य बातें
- हरिशंकर परसाई ने जबलपुर से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन-संपादन किया।
- NIOS उनकी ‘पीढ़ियाँ और गिट्टियाँ’ के जरिए व्यंग्य की विधा समझाता है।
- ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ को 1982 का हिंदी साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला।
स्रोत और संदर्भ
- State Council of Educational Research and Training, Chhattisgarh · हिंदी कक्षा 10, पाठ 2.3 “अपनी-अपनी बीमारी”—लेखक परिचय ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- National Institute of Open Schooling · पीढ़ियाँ और गिट्टियाँ—हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना का मूल्यांकन ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
- Sahitya Akademi · साहित्य अकादेमी पुरस्कार सूची—हिंदी ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।



